रियाज़ और साँस

हमारे बहुत साथियों ने रियाज़ करते समय साँस लेने के सही तरीके के बारे में पूंछा है. साँस एक बड़ी अनोखी प्रक्रिया है. साँस शरीर को भी प्रभावित करती है और मन को भी. साँस के सही नियंत्रण से शरीर भी स्वस्थ होता है और मन भी.  संगीत के रियाज़ में चूंकि शरीर और मन दोनों बड़ी भूमिका निभाते हैं इसलिए साँस का अभ्यास संगीत (गायन) में बड़ा महत्व रखता है और इसलिए इस पेज में हम साँस के बारें में जानेंगे.

१. रियाज़ करते समय मुह से साँस लेना स्वाभाविक और आसान लग सकता है लेकिन, साँस सिर्फ नाक से ही लेना है.

२. गाते या रियाज़ करते समय, जब साँस भरनी हो तो मुंह बंद करें और फिर नाक से साँस भरें. शुरुआत में नाक से साँस लेने में समय ज्यादा लग सकता है और थोड़ा अजीब लगे लेकिन, जैसे तैराकी में मुंह पानी के ऊपर लेकर साँस लेने का अभ्यास करना पड़ता है, वैसे ही, गाते समय साँस लेने का प्रयासपूर्वक अभ्यास करते रहना चाहिए ताकि रियाज़ करते समय साँस अपने आप नाक से आने लगे.

३. रियाज़ करते समय (वैसे तो बाकी समय भी), रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, सीना जितना संभव हो (बिना दर्द हुए) उतना अधिक फैला कर रखें. इससे फेफड़ों में अधिकतम साँस का आना जाना संभव हो पाता है जो कि गायन के लिए मदद करता है.

४. अब एक बहुत महत्वपूर्ण बात. बहुत लोगों को इसका अंदाज़ा नहीं होता की हम दो तरीके से साँस ले सकते हैं. पहले तरीके में हम शरीर के ऊपरी हिस्से (छाती की हड्डियां और आसपास) को फुला कर और कन्धों को उचका कर सांस  लेते हैं. दूसरे तरीके में हम पेट के हिस्से को फुलाकर सांस अंदर खींचते हैं जबकि छाती और कंधे बिना ज्यादा हिले स्थिर रहते हैं. गायन के लिए साँस लेने की दूसरी विधि (पेट वाली) बहुत कारगर होती है. इसकी दो वजहें है. पहली तो ये की उसमे छाती और कंधे ज्यादा तनाव रहित होते हैं जिसकी वजह से सुर (आवाज़) ज्यादा सधे और नियंत्रण में रहते है. दूसरी ये की इस विधि से साँस ज्यादा गहरी होती है और साँस की ज्यादा शक्ति गाने के लिए इस्तेमाल हो सकती है. 


५. अगर रियाज़ के समय गलत साँस लेने की विधि प्रयोग होती रहे तो ऐसा हो सकता है की बहुत जल्दी थकान या फिर तनाव महसूस हो. इससे हाइ ब्लड प्रेसर का अनुभव भी हो सकता है. अगर ऐसा हो तो रियाज़ को ज्यादा लम्बा न खींचे और अपने साँस लेने की विधि को जाँच ले.

६. रोज़ कम से कम १५-२० मिनट सही तरीके से साँस लेने का अभ्यास करें. गहरी साँस लें और फिर छोड़े, लें फिर छोड़ें। अगर ऐसा करते समय जम्हाई आती है तो स्वाभाविक है, परेशान न हो. एक बार अभ्यास हो जायेगा तो अपने आप जम्हाई से मुक्ति मिल जाएगी.

७. गायन कला साँस की लय और संगीत की लय का बड़ा बारीक़ तालमेल है. साधरणतयः गाते समय कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा साँस भर के (वो भी सही समय पर), और फिर साँस को धीरे धीरे छोड़ते हुए, साँस का भरपूर इस्तेमाल करते हुए गायन किया जाता है. गाने के बीच साँस लेना एक कला है. बहुत जल्दी साँस लेने पर या जल्दी साँस भर के रोके रखने पे गायकी में तनाव आ सकता है, या फिर लय बना कर रखने में परेशानी हो सकती है.

८. और एक बात. गाने के अलग अलग हिस्सों में अलग तरह की सांस की जरूरत होती है. अगर छोटा हिस्सा गाने का है तो  थोड़ी साँस चाहिए, आलाप जैसा बड़ा हिस्सा है तो लम्बी साँस चाहिए. इसलिए, अगर छोटे हिस्से का गायन है तो लम्बी साँस भरने पर उसे जल्दी ही निकलना पड़ सकता है और फिर तुरंत अगले गायन के हिस्से के लिए साँस लेनी पड़ेगी जोकि आसानी से नहीं होता। इसीलिए, जो भी अगला आने वाला गायन का हिस्सा है, उसको अंदाज़े में रख कर अगली साँस उसी हिसाब से थोड़ी या लम्बी लेनी चाहिए.